अमर शहीद भूपेन्द्र कालीराणा
अमर शहीद भूपेन्द्र कालीराणा का जन्म जोधपुर जिले की भोपालगढ़ तहसील के बुड़किया गांव में पिता चौधरी श्री डांवर राम के यहां 1 अक्टूबर 1987 को माता मथूरा देवी की पवित्र कोख से हुआ। पूरा परिवार सेना में होने के कारण बचपन से ही सेना में रुची रखने वाले चंचल स्वभाव के भूपेन्द्र राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय बुड़किया से 12वीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद 9 अक्टूबर 2006 को भारतीय सेना में चयनित हो गए। अपनी सैनिक कुशलता के चलते दक्षिण अफ़्रीका, सूडान में सेवाए दी। 12 मार्च 2011 को गुड्डी के साथ उनका विवाह हुआ था। एक वर्ष के बाद उनके पुत्र सूर्य का जन्म हुआ। भूपेन्द्र के शहीद होने के 7 माह बाद उनके पुत्र प्रकाश का जन्म हुआ।
जब देश में थी दीवाली
वो खेल रहे थे खून की होली
जब हम बैठे थे घरों में वे झेल रहे थे गोली।
सन् 13 नवम्बर 2012 में आप श्रीनगर के नौ गांव सेक्टर में तैनात थे। उस वक्त दीपावली की रात थी सारा देश जहां दीपोत्सव की खुशियां मना रहा था वही भारत माँ के ये अनमोल बेटे अंधेरे में बर्फ से ढकी पहाडि़यो पर देश की सेवा का धर्म निभा रहे थे। रात्रि के लगभग 10 बजे इन्हें सूचना मिली की 9 सबूरी की घाटियो में कुछ आंतकी सीमा में प्रवेश कर रहे हैं। देश की सबसे पराक्रमी जंगी जाट रेजिमेंट के ये जांबाज जान की परवाह किए बगैर '' आपरेशन रक्षक '' के तहत आंतकवादियो का सर्वनाश करने निकल पडे़। लगभग 4 घंटे चली आमने - सामने की मुठभेड़ में सभी घुसपैठिए मारे गए। दुश्मन की गोली लगने के कारण जाबांज सिपाही भूपेन्द्र कालीराणा अपने साथी महेन्द्रपाल जाट के साथ वीरगति को प्राप्त हो गए। उनका पार्थिव शरीर तिरंगे झण्डे में लिपटे हुए विशेष विमान द्वारा जम्मू-कमीर से उनके पैतृक गांव बुड़किया लाया गया। शहीद भूपेन्द्र के 6 माह के पुत्र सूर्य ने मुखाग्नि दी। उसे क्या पता था कि उसके पिता देश के काम आ गये। वो हमेशा के लिए भारत माता के आंचल में चिरनिन्द्रा में सो गए। भूपेन्द्र जिस स्कूल में पढा़ उसी के सामने और जिस मैदान पर बचपन से लेकर अंतिम समय तक बाँलिबाँल खेली उसी जगह उनका अंतिम संस्कार हुआ तथा वही पर शहीद स्मारक बनाया गया है।
पूरा परिवार सेना में था इसलिए फौज में भेजने की बजाय दूसरी नोकरी करवाना चाहते थे लेकिन भूपेन्द्र यही कहता कि-में नोकरी के लिए नहीं बल्कि शहीद होने के लिए सेना में जाउंगा। कुछ कर गुजरने का जूनून व जज्बा उन्हें सेना में ले गया। वाकई शेर दिल इन्सान निकला तीन साथी तो शहीद हुए लेकिन 9 आंतकवादियो को ढेर कर दिया था।


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