वीर तेजाजी की जीवनी
वीर तेजाजी की जीवनी
सातवीं शताब्दी के अन्त मे चक्रवृृती सम्राट हर्षवर्धन के निधन के बाद भारत अनेक जनपदों मे विभक्त हो गया। उनमें एक खरनाल जनपद था जिनके शासक धौल्या वंश के जाट थे।इस जनपद के गणपति नागवंशी बोहितराव के पुत्र ताहड़ देव थे जो बहादुर योधा थे और शिव उपासक थे।इनका साम्राज्य उत्तरी भारत मे दिल्ली व आगरा तक था कुछ इतिहासकारो का मानना है कि आगरा के ताजमहल की मूल बनावट शिंव मंदिर जैसी है मुगलो ने चारो कोनो पर मीनारे बनाकर इसे मकबरे की तरह बना दिया। असल मे यह शिंव मंदिर, शिंव उपासक नागवंशी जाटो द्वारा बनाया गया था। नागवंशी बहादुर व शिंव उपासक थे। ताहड़ देवजी की छठी संतान कुंवर तेजपाल थे जिनका अवतार विक्रम संवत 1130 माघ शुक्ला चतुदर्शी गुरुवार तदनुसार 29 जनवरी 1074 ई. के दिन रानी रामकंवरी की पवित्र कोख से भगवान शिव के रूप मे हुआ। खरनाल जनपद मे खुशी की लहर दोड़ गई। ताहड़ देवजी पुत्र के आभा मंडल को देखकर फुले नहीं समा रहे थे।पुत्ररत्न की प्राप्ति पर किसान वर्ग मे दान पुण्य करने की परम्परा रही है इसी परम्परा का निर्वाह करते हुए जन पदाधिकारी ताहड़ देव अनाज वस्त्र और मोहरे लेकर सैंकडो़ गाडि़यो के साथ पुष्कर तीर्थ यात्रा के लिए निकल गए। उधर पनेर जनपद के गणपति जयमलजी मुथा ( झांझर ) पुष्कर स्नान के लिए तीर्थराज आये हुए थे। दोनों ही गणपति रोज पुष्कर स्नान करते व दान दक्षिणा गरीबो को देते। ताहड़ देवजी ने कभी भी पाखंडियो व धुर्त लोगो को दान नही दिया उन्होने हमेशा अच्छे साधू-संतो व जरूरतमंदो की सहायता की। रोज-रोज साथ नहाना व दान देते-देते एक दुसरे में परस्पर मेल-जोल बढ गया और यही मेल-जोल राजकुमार तेजपाल व राजकुमारी पेमल का रिश्ता करके रिश्तेदारी मे बदल गया। जैसा की पुराने जमाने मे बाल्याकाल में विवाह प्रतिष्ठा का सूचक था। राजकुमार तेजपात व राजकुमारी पेमल का विवाह पुष्कर घाट पर सम्पन्न हो गया। तीर्थ यात्रा से लोटकर ताहड़ देवजी वापस खरनाल आये।
कुँवर तेजपाल शिव अवतार थे वह बचपन में हमेशा शिव उपासना व जीव जन्तुओ के कल्याण के बारे में सोचते रहते थे। कुँवर तेजपाल धर्म प्रेमी, प्रजा मात्र पर दया भाव रखने वाले, छुआछूत से दूर और गरीबों के हमदर्द थे। कुँवर तेजपाल अपने साथियों से हमेशा कहा करते थे कि मानव शरीर भगवान द्वारा निर्मित है इसलिए सब ईश्वर की संतान है इसमें ऊँच नीच मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए बनाता है। स्वस्थ एवं मजबूत इंसान का काम कमजोर व असहाय की सहायता करना होता है न की कमजोर को सताना। ईश्वर ने हमें संसार की सेवा करने का मौका दिया है। कुंवर तेजपाल राजा के पुत्र थे लेकिन उन्होने कर्म से कभी मुँह नहीं मोडा़। वह कृषि कार्य स्वयं करते थे। कृषि के क्षेत्र में कुँवर तेजपाल ने अधिक उपज के लिए खेती के नये तरीके किसानों को बताये। कुँवर तेजपाल ने जब देखा कि किसान बीज को खेत में उछालकर उसके ऊपर बेलो से लकडी़ को घसीटते है तो उन्होने किसानों के लिए हल का अविष्कार किया और बीज को उरकर कतारो में बुवाई करने की विधी बताई। कतार से कतार के बीच की दूरी तय की गई। कुँवर तेजपाल को इसलिए कृषि वैघ्यानीक भी कहा जाता है। इस बात की पुष्टि उनकी माता द्वारा यह कहना की कमी बाळदी के भायोडा़ निपजे मूंग मोठ, थारा रे भायोडा़ मोती निपजे इसका अर्थ है कि नौकर जो कि विधि पूर्वक खेती करना नहीं जानते हैं।
उनके द्वारा बोई गई फसल से तो सिर्फ मूंग मोठ ही पैदा होंगे और तुम कृषि के बारे मे जानकारी रखता है इसलिए तेरे बोये हुए मोती निपजेंगे। तेजपाल की माँ का मोतियो से आश्य अधिक उत्पादन से है।
कुँवर तेजपाल को शिव भगवान द्वारा दिव्य शक्ति प्राप्त थी इसलिए उन्होने गाय के गुणों को पहचाना। गायो को पालने के लिए लोगों को प्रेरित करते। गाय के दुध,मूत्र व गोबर के औषधिय गुणों से लोगों को अवगत कराया। गाय के गोबर से घरों को निपना कुँवर तेजपाल ने ही जनता को बताया। इससे पहले लोग सिर्फ घारे से घर निपते थे।कुँवर तेजपाल 25 वर्ष के होते होते देश की जनता के आदर्श बन चुके थे। शिंव आराधना से भक्ति मार्ग में अपनी छाप छोड़ी तो उन्नत कृषि विधी से किसानों के चहते बने। अन्याय करने वालो में अपनी शूरवीरता से खौफ पैदा किया और गरीब व कमजोर के लिए आशा की किरण जगाई। दूर दूर तक कुँवर तेजपाल का यशोगान होने लगा। विद्वान व संत लोग खरनाल राज्य मे आने लगै,दुष्ट व चोर देश छोड़कर भागने लगे।
कुँवर तेजपाल एक दिन खेत में हल जोत रहे थे। दोपहर का भोजन लेकर देरी से पहुंची भाभी ने देरी से आने का कारण घर के काम की अधिकता को बताया। तब कुँवर तेजपाल ने घर के काम काज में हाथ बटाने के लिए अपनी पत्नी को लाकर भाभी की मदद करना चाहते थे। कुँवर तेजपाल घर आकर माँ रामकंवरी से ससुराल का पता पूछा। माँ ने कहा ससुराल जाने से पहले बहन राजल को ससुराल से लेकर आ। कुँवर तेजपाल बहन को लेकर आते हैं। फिर ससुराल जाने के लिए रवाना होते हैं तो पंडितजी ने मुहूर्त ठीक नहीं होने की बात कहीं लेकिन कुँवर तेजपाल को ईश्वर में अटुट आस्था थी उन्होने कहा हरी करे सों खरी और गाँव से ससुराल के लिए रवाना हो गये।
ससुराल में राजकुमारी पेमल की सहेली ' लाछा गुजरी ' की रात को चोर गायें चुराकर ले गए। उन्होने आकर वीर तेजाजी से मदद मांगी फिर तेजाजी ने लाचार महिला पर आये संकट व गौ माता की रक्षा करना अपना धर्म समझा और 350 चोरो को मारकर लाछा गुजरी की गायें वापस लाये इस बीच जब गायों को लाने वीर तेजाजी जा रहे थे तो रास्ते में अग्नि में जलतें काले नाग को बाहर निकाला जिससे नाग नाराज हो गया और उन्हें डसने लगा। जब कुँवर तेजपाल ने वचन दिया कि मैं गायें लाकर अपने आप को डसवाने के लिए तेरे पास वापस आऊंगा। इस पर नागराज ने कहा कि इस बात की जमानत कोन ले कि तुम वापस आओगे। तो फिर वीर तेजाजी ने एक खेजडे़ और चाँद सूरज की जमानत दिलवाई। वीर तेजाजी ने गायें लाकर नाग को दिया अपना वचन निभाया। ऐसे कुँवर तेजपाल जो कि गौं रक्षक,शूरवीर,कृषि वैज्ञानिक,सत्यवादी,वचनो के पालन करने शिंव अवतार ने तीस वर्ष की अल्प आयु में भादवा सुदी दशमी विक्रम संवत 1160 तदनुसार 28 अगस्त 1103 को गौ रक्षार्थ शहीद हो गये।
उनकी शहादत का समाचार सुन राजकुमारी पेमल कुँवर तेजपाल ने साथ सती हो गई और दुनिया को आशीर्वाद दिया कि कभी किसी औरत का सुहाग संकट में हो तो मेरे नाम का स्मरण कर लेना पति का संकट टल जायेगा। जब घोड़ी लीलण ने खरनाल जाकर कुँवर तेजपाल के शहीद होने के समाचार सुनाये तो बहन राजल व धर्म बहन कोयलबाई सती हो गई। घोड़ी लीलण ने भी प्राण त्याग दिए। भाई की सलामती के लिए बहंने बुंगरी माता व कोयलबाई की पूजा करती हैं। कुँवर तेजपाल दुखहारियो के दुख हरने के कारण पूरे देश में इनकी पूजा होने लगी व कुँवर तेजपाल वीर तेजाजी के नाम से प्रसिद्ध हो गये।आज पूरे भारत देश में सबसे अधिक मेले वीर तेजाजी के नाम से भरे जाते हैं।सुरसुरा व ब्यावर में सबसे बड़े मेले भरते है।।

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